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तालिबान के गढ़ में होती है दुर्गा की पूजा, आतंकी भी नहीं तोड़ सके मंदिर

admin
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तालिबान के गढ़ में होती है दुर्गा की पूजा, आतंकी भी नहीं तोड़ सके मंदिर। मां जगदंबा का ऐसा ही एक प्राचीन मंदिर अफगानिस्तान में है। अफगानिस्तान के मौजूदा हालात से सब परिचित हैं। ऐसे में वहां दुर्गाजी के मंदिर का होना किसी आश्चर्य से कम नहीं लगता।

भारत के विभिन्न गांव तथा शहरों में मां जगदंबा के अनेक मंदिर हैं। यूं तो नवरात्र को मां की भक्ति का विशेष समय माना जाता है लेकिन जब मन में श्रद्धा हो तो मां की पूजा के लिए हर क्षण पवित्र होता है।

क्या भारत से बाहर विदेशों में भी मां दुर्गा के मंदिर हैं? आपको यह जानकर आश्चर्य हो सकता है कि आज भी कई इस्लामी देशों में दुर्गाजी के मंदिर हैं। हालांकि उनमें भक्तों की उतनी भीड़ नहीं होती, जितनी भारत में होती है लेकिन आज तक उनका अस्तित्व बरकरार है।

मां जगदंबा का ऐसा ही एक प्राचीन मंदिर अफगानिस्तान में है। अफगानिस्तान के मौजूदा हालात से सब परिचित हैं। वहां तालिबान और विभिन्न आतंकी गिरोहों की वजह से नागरिक भी सुरक्षित नहीं हैं। तालिबान द्वारा भगवान बुद्ध की ऐतिहासिक प्रतिमा को खंडित करने की घटना पूरे विश्व में चर्चा का विषय बनी थी।

ऐसे में वहां दुर्गाजी के मंदिर का होना किसी आश्चर्य से कम नहीं लगता। यह मंदिर अफगानिस्तान की राजधानी काबुल में है। यहां मां जगदंबा आसा माई के नाम से विराजमान हैं।

जानकारी के मुताबिक अफगानिस्तान की राजधानी काबुल में मां शक्ति का मंदिर आसा पहाड़ी पर स्थित है। लोगो की मान्यता है कि मां शक्ति आसमाई रूप में अपने भक्तों को कभी निराश नही करती उनकी सभी मनोकामना पूरी करती हैं।

इसीलिए इन्हें आसमाई नाम से जाना जाता है। मां के इस स्वरूप के नाम पर ही इस पहाड़ी का नाम आसा पहाड़ी रखा गया। माता के इस मंदिर में माता के अलावा कई अन्य देवताओं की प्रतिमा हैं। इस मंदिर के पास एक बड़ी शिला है। यह शिला पंजसीर का जोगी नाम से प्रसिद्ध है।

आसा माई के बारे में कहा जाता है कि वे अपने भक्त की हर शुभ आशा पूर्ण करती हैं। उनके दरबार में आया भक्त अन्न, धन और जीवन का सुख प्राप्त करता है। उस पर सदैव मां भगवती की कृपा होती है। कहा जाता है कि आज भी मां यहां शेर की सवारी करती हैं और उसका जो भक्त संकट में होता है, वे उसकी रक्षा करती हैं।

का यह मंदिर एक पहाड़ी पर स्थित है। श्रद्धालु इसे आसा पहाड़ी कहते हैं। यहां ऊंची चोटी पर जगदंबा निवास करती हैं। यहां मां के साथ ही विभिन्न देवी-देवताओं की मूर्तियां भी हैं। मंदिर के निकट एक विशाल शिला स्थापित है।

इसे पंजसीर का जोगी कहा जाता है। कहते हैं कि किसी समय एक जोगी यहां तपस्या करने आया था। उसका शरीर बाद में शिला के रूप में परिवर्तित हो गया। तब से वह शिला के रूप में ही मां के चरणों में बैठा है।

इस जोगी के बारे में लोगो की मान्यता है कि करीब 151 साल पहले जोगी इस जगह पर तपस्या करने आए थे। लेकिन स्थानीय लोगों ने उन्हें उनकी तपस्या नही करने दी उनकी तपस्या में बाधा पहुचते थे, बहुत परेशान करते थे। उनकी तपस्या पूरी ना हो पाने की वजह से वह शिला रूप लेकर मां के चरणों में स्थापित हो गए। तभी से यह शिला को उनके नाम से प्रसिद्ध है, उन्ही के नाम से पहचानी जाती है।

यह मंदिर एक प्राचीन शक्तिपीठ है। किसी समय यहां काफी संख्या में श्रद्धालु मां के सामने मत्था टेकने आते थे। अब यहां की फिजाओं में दहशत की गंध घुली हुई है लेकिन श्रद्धालु इस बात की परवाह नहीं करते और यहां मां के दर्शन करने आते

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