22 साल पहले दूसरी ‘शोले’ दिखाने निकले आमिर, फिल्म को सिनेमाघर तो मिला, पर दर्शक ही नहीं आये

22 साल पहले दूसरी ‘शोले’ दिखाने निकले आमिर, फिल्म को सिनेमाघर तो मिला, पर दर्शक ही नहीं आये

ऐसा नहीं है कि ‘लाल सिंह चड्ढा’ मिस्टर परफेक्शनिस्ट आमिर खान के करियर की पहली और इकलौती महाफ्लॉप है. कई मर्तबा दिखा है जब एक्टर की फ़िल्में बॉक्स ऑफिस पर नहीं चली हैं. 22 साल पहले कई हिट फ़िल्में देने के बावजूद आमिर का दर्जा उस तरह विशेष नहीं था जैसे आज की तारीख में दिखता है. लेकिन 22 साल पहले एक फ्लॉप के बाद एक्टर नए नवेले हो गए. उनका करियर में बड़ा यूटर्न बन गया. साल 2000 में एक्टर की फिल्म आई थी- मेला. इसमें उनके भाई फैसल खान भी सपोर्टिंग एक्टर थे. जबकि ट्विंकल खन्ना उनकी हीरोइन थीं. धर्मेश दर्शन के निर्देशन में बनी मेला एक मसाला एंटरटेनर थी.

फिल्म में डाकुओं की समस्या के बहाने बॉलीवुड के सभी आजमाए मसाले ठूस-ठूसकर भरे गए थे. एक्शन, रोमांस और कॉमेडी से सराबोर थी फिल्म. रिलीज से पहले जबरदस्त हाइप बनी थी. उस जामने में फिल्मों के सभी गाने बहुत पहले रिलीज कर दिए जाते थे. डिजिटल का ज़माना नहीं था. और गाने फिल्म के प्रमोशन में बहुत मददगार साबित होते थे. मेला के कुछ गाने लोगों की जुबान पर चढ़ गए थे. कमरिया लचके रे और मेला दिलों का तो बहुत पॉपुलर हुआ. असल में तब मेला का प्रचार एक तरह से बॉलीवुड की ‘दूसरी शोले’ के रूप में भी किया जा रहा था. कहानी भी शोले के आसपास ही दिखती है. एक गांव डकैतों के जुल्म से परेशान है. एक नौटंकी का एक्टर और ट्रक ड्राइवर दोस्त हैं. इत्तेफाक ऐसे बनते हैं कि दोनों दोस्त उसी गांव में पहुंच जाते हैं. मुंबईया फिल्म में आगे क्या क्या हो सकता है इसे बताने की शायद जरूरत ना पड़े.

लाल सिंह की तरह लागत भी वसूल नहीं पाई थी करोड़ों में बनी फिल्म
मेला की कहानी भले एक हद तक शोले से प्रेरित थी मगर हकीकत में रत्तीभर भी शोले जैसे बात नहीं थी. दर्शकों ने बहुत बुरी तरह से मेला को खारिज कर दिया था. मेला अपना बजट तक वसूल नहीं पाई थी. उस जमाने में 25 करोड़ में बनी फिल्म देसी बॉक्स ऑफिस पर बहुत मुश्किल से 15 करोड़ का लाइफटाइम कलेक्शन निकालने में कामयाब हुई थी. मेला के बाद आमिर के करियर में एक्टर के रूप में जबरदस्त बदलाव देखा जा सकता है. वो चाहे उनकी फिल्मों का विषय हो, उनके किरदार हों या फिल्म मेकिंग. ठीक एक साल बाद 2001 में ‘लगान’ और ‘दिल चाहता है’ में अपनी छवि से अलग नए आमिर का पुनर्जन्म होता है. ठग्स ऑफ़ हिन्दोस्तान तक अगर मंगल पांडे और तलाश जैसे अपवाद छोड़ दिए जाए तो आमिर की कोई फिल्म फ्लॉप नहीं हुई थी. जबकि कई तो बॉलीवुड की महा ब्लॉकबस्टर थीं.

मेला के हादसे ने परफेक्शनिस्ट बनाया, सवाल है लाल सिंह के आगे क्या?
ये दूसरी बात है कि आमिर के समकालीन अभिनेताओं में शुमार शाहरुख, सलमान, अजय देवगन और अक्षय कुमार साल में चार-चार फ़िल्में तक कर रहे हैं वहीं मिस्टर पर फेक्शनिस्ट एक ही फिल्म करते हैं. साल 2000 के बाद एक दो मौकों पर उनके फिल्मों की संख्या दो नजर आई है. इसमें भी कई साल ऐसे रहे हैं जब एक्टर ने कोई फिल्म ही नहीं की. यही वजह है कि आमिर के खाते में दूसरे सितारों से कम फ़िल्में हैं. बतौर लीड एक्टर 50 से ज्यादा फ़िल्में नहीं की हैं उन्होंने. 22 साल पहले जब मेला सुपरफ्लॉप हुई थी एक्टर को एक बेसिरपैर की कहानी के लिए तीखी आलोचनाओं का सामना करना पड़ा था. बाद में क्या हुआ- यह उनके करियर के 22 सालों में साफ़ नजर आता है.

अब सवाल है कि मेला की तरह एक्टर फिर ‘लाल सिंह चड्ढा’ के लिए कड़वे अनुभव का सामना कर रहे हैं. तो क्या आमिर एक और यूटर्न लेने वाले हैं जैसा कि उन्होंने मेला के बाद लिया था. इसका जवाब अभी देना जल्दबाजी है. क्योंकि एक्टर के रूप में दूसरे अभिनेताओं के मुकाबले उनमें अभी भी बहुत ज्यादा संभावना नजर आती है. उन्हें सलमान या शाहरुख की तरह चुका हुआ अभिनेता नहीं कहा जा सकता. मगर जिस तरह और जिन वजहों से लाल सिंह चड्ढा के रूप में उन्हें नाकामी झेलनी पड़ी है- हालात एक आशंका की ओर संकेत रो देते हैं. संकेत यह कि बतौर हीरो एक्टर शायद अपनी पारी को विराम दें. इसकी वजहे हैं.

लाल सिंह चड्ढा जिस तरह फ्लॉप हुई क्यों आगे भी आमिर की सक्सेस गारंटीड नहीं ?
रिलीज के पहले से ही लाल सिंह चड्ढा का सोशल मीडिया पर जबरदस्त विरोध दिखा. ज्यादातर समीक्षाएं भी खराब रही. लेकिन दूसरा पहलू यह भी है कि एक्टर के फिल्म की तारीफ़ करने वालों की संख्या भी कम नहीं और उनकी नजर में लाल सिंह चड्ढा एक मनोरंजक फिल्म है. आमिर के कुछ आलोचकों ने भी माना कि टॉम हैंक्स की फॉरेस्ट गंप से तुलना को छोड़ दिया जाए तो अपनी बुनावट में एक्टर की फिल्म देखने लायक है. कुछ लोग तो यह भी कहते दिखे कि फिल्म को कारोबारी नुकसान निगेटिव कैम्पेनिंग की वजह से ही हुआ, खराब कंटेंट की वजह से नहीं. खासकर- पीछे हिंदू मुस्लिम की राजनीति.

अब सवाल है कि जब अच्छी फिल्म करने के बावजूद अगर आमिर को कारोबारी नुकसान ही उठाना पड़े तो भला कोई नुकसान के लिए हीरो के रूप में फ़िल्में क्यों करेगा? ऐसा भी नहीं है कि जिन पुराने मुद्दों को लेकर उनकी फ़िल्म का विरोध किया गया वो लाल सिंह चड्ढा की नाकामी के बाद ख़त्म हो जाएंगे. लोग पुरानी चीजों को भूलते तो नजर नहीं आ रहे हैं. आमिर के खिलाफ तैयार जनभावना आगे भी लगभग बरकारार ही रहेगी. कम से कम मौजूदा राजनीतिक ट्रेंड तो यही पुख्ता कर रहे हैं कि फिलहाल ऐसे निगेटिव कैम्पेनिंग का एक्टर के पास कोई तोड़ नहीं है. स्वाभाविक है कि आमिर पैसे डुबाने के लिए हीरो बनना पसंद नहीं करेंगे.

हालांकि यह अटकल भर है. क्योंकि एक्टर कमबैक के लिए मशहूर हैं. मगर आमिर का कम फ़िल्में करना और इधर के दिनों में प्रोड्यूसर के रूप में उनकी सक्रियता से संकेत मिलता है कि वे मौजूदा हालात में फिल्म निर्माण के ज्यादा सुरक्षित विकल्प को आजमाएं. उनके बेटे जुनैद खान भी बॉलीवुड डेब्यू करने वाले हैं. हो सकता है कि एक्टर खुद के लिए फ़िल्में बनाने की जगह बेटे और बेटी को फिल्म उद्योग में जमाने की कोशिश करें. लाल सिंह चड्ढा के प्रमोशन में बेटे को जमाने की उनकी कोशिशें दिख भी चुकी हैं. कुछ भी हो सकता है. यह भी नहीं भूलना चाहिए कि आमिर हार मानने वाले एक्टर नहीं हैं.

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